Wednesday, September 29, 2010

टूटती आस





पथरीली राहें हैं

मन में आहे हैं

कभी ऊपर तो

कभी नीचे निगाहें हैं



मंजर देख पूछनी चाही जो वजह

सुनाई दी बस कराहें ही कराहें हैं



सपरीली राहें और बढ़ता सफर

रह रहकर मन जाता था सिहर



सफर का इक छोर जब हुआ पूरा

लगा जीवन है अभी भी अधूरा



रूबरू हुआ तो देखा भयवाह मंजर

जान गया हालात हैं कितने भयंकर



ठहरे यहां जो दो चार दिन

स्थिति देख मन हुआ खिन्न



नहीं रात जगमग, न उजला है दिन

हर जगह संकट है भिन्न-भिन्न



हाल पूछा जो किसी से हमनें

सुना दिए उस शख्स ने नगमें



'नेता आए, अभिनेता आए

आए कुछ समाजसेवक भी...

वहीं हैं हम जहां पड़े थे

न बदली किस्मत न बदला जग भीÓ


दिखीं जो पानी की कुछ बूंदे

चला गया वह वृद्ध आंखे मूंदे



देख नजारे हुआ अहसास

पहाड़ का जीवन 'टूटती आसÓ

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