Tuesday, October 19, 2010

ये कैसा इंसाफ !

कानून अंधा है ये तो सुना ही था लेकिन इंसाफ का चेहरा ऐसा भी होता है ये शायद मैं ही नहीं बल्कि सभी पहली बार ही देख रहे हैं। यहां इंसाफ के जिस चेहरे की बात मैं कर रहा हूं वह है राखी का इंसाफ। इन दिनों टीवी दर्शक इंसाफ के जिस चेहरे से रू-ब-रू हो रहे हैं उसके बारे में मेरी राय यही है कि इंसाफ दिलाने का इससे बदतर तरीका कोई और हो ही नहीं सकता। दर्शक इस सीरियल को देखते जरूर हैं लेकिन इसके पक्ष में वे कतई नहीं हैं कि इंसाफ के नाम पर किसी भी चैनल को ऐसा करना चाहिए या इसकी अनुमति दी जानी चाहिए। जाहिर है इससे समाज पर जो प्रभाव पड़ेगा वह सुखद तो हो ही नहीं सकता, हां उसका कुप्रभाव कितना अधिक होगा यह देखने के लिए अभी इंतजार कीजिए। इससे पहले भी ऐसे कुछ सीरियल आए और चले गए, उनके कुप्रभाव भी देखने को मिले। लेकिन मानवता और सामाजिक मूल्यों से खिलवाड़ का ये सिलसिला यूं ही जारी है। 'सच का सामनाÓ करते करते कितनों के घर उजड़ गए इसका सटीक आकलन तो संभव नहीं है पर इसका कुप्रभाव हमें यह बताने के लिए काफी था कि ऐसे सीरियलों को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। वहीं, 'राज पिछले जन्मÓ का राज जनता की समझ में भले न आया हो, पर ज्योतिषियों, भविष्यवक्ताओं के लिए यह राज सफलता का राज बन गया। हालांकि, कुछ जागरूक किस्म के लोगों ने, तो कुछ संगठनों ने पब्लिसिटी की खातिर इन सीरियलों को विरोध जरूर किया लेकिन स्थिति अभी भी बहुत नहीं बदली। इसी का परिणाम है कि अब 'राखी का इंसाफÓ सामने है। इसमें जो कुछ दिखाया जा रहा है वह भी समाज को किस दिशा में ले जाएगा यह समझना ज्यादा मुश्किल तो नहीं, हां इसे देखना भर बाकी है। जाहिर है हम (जनता) आज भी देर से जागने के आदी हैं, नहीं तो ऐसे बेतुके और बदमिजाजी भरे सीरियलों को शुरू होने ही नहीं दिया जाना चाहिए। बचपन से सुनते आ रहे हैं..अब पछताय होत क्या जब चिडिय़ा चुग गई खेत.. लेकिन इस पर हमनें कभी गौर तक नहीं फरमाया। नहीं तो आज ये स्थिति नहीं होती। यदि हमें समाज में एक अच्छा माहौल बनाए रखना है तो हमें ऐसे सीरियलों का विरोध करना चाहिए, बजाए इसके कि ऐसे सीरियलों को देख टाइम पास किया जाए! अक्सर देखा गया है कुछ लोग ऐसे दृश्यों को देख अपना मन बहलाते हैं और इन सीरियलों को देखने को उत्सुक रहते हैं इसी से चैनल की टीआरपी बढ़ती है और अन्य चैनल भी इस तरह के सीरियल बनाने, प्रस्तुत करने को पे्ररित होते हैं। यदि ऐसे ही दो चार सीरियल और शुरू होते गए तो ये जान जाइये कि आपका समाज किस दिशा में आगे बढ़ रहा है....?

Wednesday, September 29, 2010

जो अतिथि दे वो भला

अतिथि देवो॒भवः की परंपरा का निर्वहन करते करते भारतीय अब थक चुके प्रतीत होते हैं। अतिथि को देवता समान मान उनकी सेवा करना तो अब किताबों कहानियाें में ही पढ़ने या सुनने को मिल जाए तो गनीमत समझिए। कुल मिलाकर आधुनिक इंडिया में नई परंपरा जन्म ले रही है वो है ‘अतिथि दे वो भला’। और जो न दे वो भूला ही सही।
कुछ विद्वान लोग इस परंपरा से खासे नाराज हैं, उनका मत है कि देश की संस्कृति, संस्कारों, परंपराओं को भूलना या उनसे छेड़छाड़ करना दंडनीय अपराध है। भला अब इन्हें कौन समझाए, पहले देश सोने की चिड़िया था, जिसे जरूरत महसूस होती उसे तब सोने के अंडे मुफ्त बांट दिए॒जाते, पर अब हालात बिलकुल बदले हुए॒हैं। यहां तो खुद भूखों मरने की नौबत आन पड़ी है, महंगाई के मारे सांसत में जान पड़ी है। ऐसे में भला हम किसी को क्या दें, जब खुद मांगने की नौबत आई हुई है। हालात यह हैं कि महीने में कई दिन तो पड़ोसियाें की चीनी, नमक से ही काम चलाना पड़ता है। ले देकर जो दिन कट जाए वो अच्छा, पर वापस देना भी तो पड़ता है। चालीस की चीनी लौटाना तो ठीक, अब तो नमक का भी हिसाब देना पड़ता है। जब नमक तक का हिसाब मांगा जाए, तो भला अतिथि की सेवा करने का जोखिम कौन उठाए।
आइये, अतिथि दे वो भला की नई परंपरा पर गौर फरमाइये.. क्या नेता, क्या अभिनेता, ये अतिथि ही हैं हर किसी के चहेता। एक जन बोला, भला इनमें ऐसा क्या है, जो चाचा-ताऊ अन्य संबंधियों में भी ना है। मैंने कहा, भैय्या यही तो आधुनिक परंपरा है, जिसका पलड़ा भरा है, वो अतिथि ही सेवा करवाने के पैमाने पर खरा है। नेता,अभिनेता भूले से भी किसी के यहां आते हैं तो उसकी बंद किस्मत का ताला खोल जाते हैं। कुछ और हो न हो कम से कम ऐसे अतिथियों के आने मात्र से चंद दिन तो फिर ही जाते हैं। पड़ोसी तो पड़ोसी, हर गली मुहल्ले और मीडिया तक में आप सम्मान पाते हैं। जिनके सगे-संबंधियों की जेबें खाली हैं तो उनके सत्कार के लिए हर घर में कंगाली है।
तसवीर का एक पहलू और है। जिसमें कहीं देश में विदेशियों के साथ अभद्रता, तो कहीं उन्हें पर्याप्त सम्मान नहीं दिए जाने का शोर है। कोई बार-बार पूछ रहा है, ये कैसा दौर है? वजह क्या है ये कौन समझाए! बेहतर होगा किताबी बातें छोड़ हकीकत पर गौर फरमाएं! कोई पूछे तो बताएंगे, बशर्ते घर आएंगे तो क्या लाएंगे... और जाएंगे तो क्या देकर जाएंगे

टूटती आस





पथरीली राहें हैं

मन में आहे हैं

कभी ऊपर तो

कभी नीचे निगाहें हैं



मंजर देख पूछनी चाही जो वजह

सुनाई दी बस कराहें ही कराहें हैं



सपरीली राहें और बढ़ता सफर

रह रहकर मन जाता था सिहर



सफर का इक छोर जब हुआ पूरा

लगा जीवन है अभी भी अधूरा



रूबरू हुआ तो देखा भयवाह मंजर

जान गया हालात हैं कितने भयंकर



ठहरे यहां जो दो चार दिन

स्थिति देख मन हुआ खिन्न



नहीं रात जगमग, न उजला है दिन

हर जगह संकट है भिन्न-भिन्न



हाल पूछा जो किसी से हमनें

सुना दिए उस शख्स ने नगमें



'नेता आए, अभिनेता आए

आए कुछ समाजसेवक भी...

वहीं हैं हम जहां पड़े थे

न बदली किस्मत न बदला जग भीÓ


दिखीं जो पानी की कुछ बूंदे

चला गया वह वृद्ध आंखे मूंदे



देख नजारे हुआ अहसास

पहाड़ का जीवन 'टूटती आसÓ